मैं चाहता हूँ मेरी कोई ग़ज़ल उस साज तक जाये ।।
जिसे सुनकर कोई मेरी ही दी आवाज़ तक आये ।।
मैं उसको मंजिल-ऐ - मक़सूद की जानब तो ले जाऊं ,
वो सब कल छोड़कर गर आज मेरे आज तक आये ।
मिला मुझ को नहीं कोई सिरा कैसे सफ़र करता ,
वो हर अंजाम से पहले नये आगाज़ तक आये ।
मुझे लगता है फिर तो हम भी वो आकाश छु लेंगे ,
तूं अप्पने पंख लेकर गर मेरी परवाज़ तक आये ।
मेरी किस्मत मेरा बिरहा मेरे ही सामने रोये ,
कोई लाखों में यूं बिरहा के तख्तो-ताज तक जाये ।
उने "जसबीर "अब तो मौत से डर ही नहीं लगता ,
जो पल पल के सफर में ज़िन्दगी के राज़ तक आये ।
Sunday, April 1, 2012
Saturday, February 18, 2012
इश्क का मसीहा
हर अणु में
दिखता है
जब
इश्क का मसीहा
तो
सपने जाग जाते हैं
अपनी ही नींद के भीतर
पलों -छिनों में
चाँद निकलता है
मन के दरवाज़े से
भीतर आता है
अँधेरा मुस्कराता है
और
रोशनी के कहीं भीतर
खुद को पाता है .........
एक संवेदना है
जिस्म के
अंग अंग में
फ़ैली हुई
एक साया
मेरे ही बिसतर से
उठता है
मुझे जगाता है
और खुद को
मुझ से
दूर कहीं पाता है ........
जागे हुए
मन से
तन से
एक अर्थ उठता है
बे-शब्द दुआ
होठों पर बैठती है
प्यास बढती है
वो साया
फिर पास आता है
जिस्म के अंग अंग में
फ़ैल जाता है ............
मैं.... तूं
तूं ....मैं
सब एक सा
हो जाता है
मैं ...तूं
तूं ...मैं
के बीच
जो कुछ भी
होता है
सहजता से
दूर चला जाता है ..........
हर अणु में
दिखता है
जब ...
..इश्क का मसीहा ।
दिखता है
जब
इश्क का मसीहा
तो
सपने जाग जाते हैं
अपनी ही नींद के भीतर
पलों -छिनों में
चाँद निकलता है
मन के दरवाज़े से
भीतर आता है
अँधेरा मुस्कराता है
और
रोशनी के कहीं भीतर
खुद को पाता है .........
एक संवेदना है
जिस्म के
अंग अंग में
फ़ैली हुई
एक साया
मेरे ही बिसतर से
उठता है
मुझे जगाता है
और खुद को
मुझ से
दूर कहीं पाता है ........
जागे हुए
मन से
तन से
एक अर्थ उठता है
बे-शब्द दुआ
होठों पर बैठती है
प्यास बढती है
वो साया
फिर पास आता है
जिस्म के अंग अंग में
फ़ैल जाता है ............
मैं.... तूं
तूं ....मैं
सब एक सा
हो जाता है
मैं ...तूं
तूं ...मैं
के बीच
जो कुछ भी
होता है
सहजता से
दूर चला जाता है ..........
हर अणु में
दिखता है
जब ...
..इश्क का मसीहा ।
Saturday, February 4, 2012
ग़ज़ल
जब से मैं तेरे साज़ की चुप हूँ ।
तब से अपनी आवाज़ की चुप हूँ ।
मुझ को मालूम नहीं कहाँ जाना ,
इस लिए हर आगाज़ की चुप हूँ ।
शब्द होते तो अर्थ मिल जाते ,
मैं तो उम्र-ऐ -दाराज़ की चुप हूँ ।
तुम ने वादा कोई निभाया था ,
मैं तेरे उस लिहाज़ की चुप हूँ ।
मैं ना 'सुकरात' हूँ ना' सरमद 'हूँ ,
मैं तो अपने ही राज़ की चुप हूँ ।
मैं तो ' जसबीर ' जीत पाया ना ,
इस लिए हर मुहाज़ की चुप हूँ ।
तब से अपनी आवाज़ की चुप हूँ ।
मुझ को मालूम नहीं कहाँ जाना ,
इस लिए हर आगाज़ की चुप हूँ ।
शब्द होते तो अर्थ मिल जाते ,
मैं तो उम्र-ऐ -दाराज़ की चुप हूँ ।
तुम ने वादा कोई निभाया था ,
मैं तेरे उस लिहाज़ की चुप हूँ ।
मैं ना 'सुकरात' हूँ ना' सरमद 'हूँ ,
मैं तो अपने ही राज़ की चुप हूँ ।
मैं तो ' जसबीर ' जीत पाया ना ,
इस लिए हर मुहाज़ की चुप हूँ ।
Saturday, January 28, 2012
दिल का जलना
दिल का जलना तो आज कल कम है ।
फिर भी आँखों में तैरता गम है ।
ज़ख़्म ऐसा मिला मुझे उनसे ,
ज़ख़्म सूखा तो दाग को गम है ।
दिन ढले ही चिराग़ रोशन हो ,
फिर न कहना के रोशनी कम है ।
उम्र भर ढूंढ़ते रहे जिसको ,
उसको मेरी तलाश का गम है ।
अब तो 'खामोश' रह के जी लो तुम
अब तो तेरे रकीब में दम है ।
फिर भी आँखों में तैरता गम है ।
ज़ख़्म ऐसा मिला मुझे उनसे ,
ज़ख़्म सूखा तो दाग को गम है ।
दिन ढले ही चिराग़ रोशन हो ,
फिर न कहना के रोशनी कम है ।
उम्र भर ढूंढ़ते रहे जिसको ,
उसको मेरी तलाश का गम है ।
अब तो 'खामोश' रह के जी लो तुम
अब तो तेरे रकीब में दम है ।
Sunday, January 8, 2012
पहचान
मुझे
अभी मेरे बारे
उतना ही पता है
जितना
आपने ..मुझे
मेरी बाबुत
कहा है
और
आपको
मेरे बारे
बस उतना ही इल्म है
जितना
मेने खुद को
आपके आगे रखा है ..........
आपने
मेरे विवहार को
स्वै-प्रगटा कहा
स्वै-विश्लेषण कहा
पर
वो मेरे
अतल की
प्रमाणिकता नहीं
आपने
मेरे शब्दों को ही
वो सब कुछ
समझ लीया
जो
अक्सर
मैं सोचता हूँ .........
आपने
बस
मेरा चिहरा पढ़ पढ़
पता नहीं
...क्या कुछ सोच लीया
...क्या कुछ समझ लीया
पर
मेरी
आत्मा का
कोरा कागज़
कोई नहीं पढ़ सका
लोग आते रहे
........जाते रहे
और
यह कोरा कागज़
सारी उम्र
मुझ को
खुद को
निहारता रहा ........
पर
आज मैं
आप सब को
बताता हूँ
के मैं
अपने ....धरातल में
कही नीचे
बहुत अकेला हूँ
वहां....
किसी के लिए भी
कोई
प्रवेश-द्वार नहीं
कोई रास्ता नहीं ........
मैं
इस अकेलेपन के
धरातल से कही नीचे
एक खज़ाना ढूंढ रहा हूँ
जो......जन्म- जन्म
मैं ही दफनाता रहा
पर
पता नहीं
कब ?कहाँ ? कैसे?
मैं उसका का
अता-पता
भूल गया हूँ.........
मुझे
पता है
जब ...मैंने
वो ..खज़ाना
ढूंढ लीया
तो आप मुझे
उतना जान सकोगे
जितना
मुझे
मेरे बारे पता है ।
अभी मेरे बारे
उतना ही पता है
जितना
आपने ..मुझे
मेरी बाबुत
कहा है
और
आपको
मेरे बारे
बस उतना ही इल्म है
जितना
मेने खुद को
आपके आगे रखा है ..........
आपने
मेरे विवहार को
स्वै-प्रगटा कहा
स्वै-विश्लेषण कहा
पर
वो मेरे
अतल की
प्रमाणिकता नहीं
आपने
मेरे शब्दों को ही
वो सब कुछ
समझ लीया
जो
अक्सर
मैं सोचता हूँ .........
आपने
बस
मेरा चिहरा पढ़ पढ़
पता नहीं
...क्या कुछ सोच लीया
...क्या कुछ समझ लीया
पर
मेरी
आत्मा का
कोरा कागज़
कोई नहीं पढ़ सका
लोग आते रहे
........जाते रहे
और
यह कोरा कागज़
सारी उम्र
मुझ को
खुद को
निहारता रहा ........
पर
आज मैं
आप सब को
बताता हूँ
के मैं
अपने ....धरातल में
कही नीचे
बहुत अकेला हूँ
वहां....
किसी के लिए भी
कोई
प्रवेश-द्वार नहीं
कोई रास्ता नहीं ........
मैं
इस अकेलेपन के
धरातल से कही नीचे
एक खज़ाना ढूंढ रहा हूँ
जो......जन्म- जन्म
मैं ही दफनाता रहा
पर
पता नहीं
कब ?कहाँ ? कैसे?
मैं उसका का
अता-पता
भूल गया हूँ.........
मुझे
पता है
जब ...मैंने
वो ..खज़ाना
ढूंढ लीया
तो आप मुझे
उतना जान सकोगे
जितना
मुझे
मेरे बारे पता है ।
Saturday, January 7, 2012
हे कविता
हे कविता
समय के इस अंतराल में
जितना
मैं
बुढापे की और बड़ा
उतनी तुम जवां हुई
मैं
जितना कांपा
जितना टूटा
उतनी तुम साबुत स्थिर रही.....
मेरे
चिहरे पर
जितनी लकीरें उभरी
उतनी तुम
संजीव होकर
उन लकीरों में
समाती रही
मेरे लिए
आकाशी शब्द
ढूंढ ढूंढकर लाती रही .........
हे कविता
अब जब
मैं
फिर तेरे करीब हूँ
तो मुझे लगता है
जाने की कोई
परिभाषा
नहीं होती
अभीलाषा
नहीं होती ।
समय के इस अंतराल में
जितना
मैं
बुढापे की और बड़ा
उतनी तुम जवां हुई
मैं
जितना कांपा
जितना टूटा
उतनी तुम साबुत स्थिर रही.....
मेरे
चिहरे पर
जितनी लकीरें उभरी
उतनी तुम
संजीव होकर
उन लकीरों में
समाती रही
मेरे लिए
आकाशी शब्द
ढूंढ ढूंढकर लाती रही .........
हे कविता
अब जब
मैं
फिर तेरे करीब हूँ
तो मुझे लगता है
जाने की कोई
परिभाषा
नहीं होती
अभीलाषा
नहीं होती ।
Sunday, March 27, 2011
ग़ज़ल p4
मुझे अब आ गया है ज़िन्दगी का फ़लसफ़ा कहना ।
जहाँ मिल जाये कुछ मस्ती उसे ही मयकदा कहना ।
मैं इक कतरा चला हूं मुस्करा कर मापने सागर ,
मेरी दीवानगी साहिल को मेरी अलविदा कहना ।
जो दरिया गुनगुनाता है नदी जब राग सा छेड़े,
उसे जा के समुन्दर की ज़रा आबो-हवा कहना।
मैं खुद अप्पना पता बनकर ही रहता हूं कहीं खुद में ,
कहाँ जायज़ है फिर मेरा खुदी को लापता कहना ।
बिना मांगे तुम्हे सबकुछ यहाँ कुदरत से मिलता है ,
इसे अपनी दुआ समझो या फिर उसकी अदा कहना।
बड़ी मुश्किल से माथे की लकीरों को बचाया है ,
बहुत मुश्किल था पत्थर को यूँ अपना आईना कहना।
किसी के भी लिए दिल में कभी रखता नहीं रंजिश ,
मुझे आता नहीं जसबीर खुद को बे-बफा कहना ।
जहाँ मिल जाये कुछ मस्ती उसे ही मयकदा कहना ।
मैं इक कतरा चला हूं मुस्करा कर मापने सागर ,
मेरी दीवानगी साहिल को मेरी अलविदा कहना ।
जो दरिया गुनगुनाता है नदी जब राग सा छेड़े,
उसे जा के समुन्दर की ज़रा आबो-हवा कहना।
मैं खुद अप्पना पता बनकर ही रहता हूं कहीं खुद में ,
कहाँ जायज़ है फिर मेरा खुदी को लापता कहना ।
बिना मांगे तुम्हे सबकुछ यहाँ कुदरत से मिलता है ,
इसे अपनी दुआ समझो या फिर उसकी अदा कहना।
बड़ी मुश्किल से माथे की लकीरों को बचाया है ,
बहुत मुश्किल था पत्थर को यूँ अपना आईना कहना।
किसी के भी लिए दिल में कभी रखता नहीं रंजिश ,
मुझे आता नहीं जसबीर खुद को बे-बफा कहना ।
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