Sunday, March 6, 2011

प्रशन पत्र

ऐ मेरे खुदा
तुम ने जो
ज़िन्दगी का प्रशन पत्र
सुलझाने के लिए दिया था
मुझे समझ नहीं आया....

मुझे पता नहीं चल सका
ये आस पास
चलते फिरते
ठहरते दौड़ते
कौन लोग थे ?......

मुझे पता नहीं चला
ज़िन्दगी क्या ?
मौत क्या ?
तृष्णा क्या ?
त्रिप्ती क्या ?
मैं कौन ?
तूँ कौन ?

मुझे बिलकुल
समझ नही आया
रिश्तों का ताना -बाना
बनते टूटते
सम्बधों के संबध
डूबते तैरते
अहसास
रोते चीखते ख्यालात
मुहब्बत
नफरत के जज़्बात .......

मुझे समझ नहीं आई
ये भाग-दौड़
कहाँ पहुचना ....?
कहाँ जाना ...?
आखिर
क्या पाना ?........

पता ही ना चला
जीवन ...
कब गुज़र गया
अखबार पड़ते पड़ते
घर की दफ्तरी
परिकर्मा करते करते
साँसों के दुःख जरते जरते
कपड़ों के रंग
चिहरे पे मलते मलते
जूतों के सपने पड़ते पड़ते .......

मुझे समझ नहीं आई
इस ऊतर पत्रिका पर
क्या लिखू
जो सोचा
बिखरता गया
हर शब्द
अप्पने ही अर्थों में
सिमटता गया .......

पर मैंने भी
अपने ही ढंग से जिया
बिना किसी खुआहिश के
बिना किसी प्राप्ति के
तृष्णा और तृप्ति के
इस युद्ध की
जैसे मुझे
खबर ही नहीं .........

मैं तेरी इस
कक्षा का
सब से पीछे
बैठा विदार्थी
जो सारा वकत
एक अफरा-तफरी
देखता रहा
और सोचता रहा
प्रशनों को
बिना किसी उतर के
और चल पड़ा
तुमे अपनी
उतर -पत्रिका देने .....

इस लिए
ऐ मेरे खुदा
तुम अपने
इस नालायक विदार्थी को
शून्य बटा सौ
दे सकते हो .....

मेरी उतर -पत्रिका
देख कर
क्या सोच रहे हो ?
क्यों सोच रहे हो ?
मैं जनता हूँ ...
तुम सोच रहे हो
इसका क्या करू ?
किस रूप में ढालूँ इसे .....

कहीं भी भेज दो
ऐ मेरे खुदा
पर मेरी
एक गुजारिश है
मुझे इंसान मत बनाना
इंसान होने की पीड़ा
मैं जान गया हूँ
पहचान गया हूँ .....

तुम
मुझे
कोई भी आकार दे दो
यहाँ तुम मुझे
पहचान सको
मैं तुमे
जान सकूं ........

नहीं
सुलझा सका
ज़िन्दगी का
प्रशन- पत्र
जो तुम ने मुझे
सुलझाने के लिए
दिया था ।



Saturday, February 26, 2011

सिरजना-------8

जब भी कभी
लिखने बैठता हूँ
मन का घोडा
दोड़ता है
चारों और
बीतीं घटनाएँ
अपनी अपनी
जगह पर बैठती
पासा फैंकती है .....

घोडा सीधा दोड़ता है
मन में बसे लोग
आपस में
वार्तालाप करतें हैं
दूर कहीं
कोई गुम सा सन्नाटा
बाहें उठाकर
नाचने लगता है ........

घोडा
दूसरी दिशा में
दौड़ना शुरू करता है
कई तरह के रंग
उभरते हैं
उन्ही रंगों में से
निकलता घोडा
कई रंगों में रंगा जाता है .....

घोडा दिशा बदलता है
मेरे भीतर से
कुछ निकलकर
उसके पीछे
भागने लगता है
उसके मुह का
स्वाद बदलता है
पर वो दोड़ता दोड़ता
अपनी मंजिल की और
बढता है .......

घोडा फिर
और तेज दोड़ता है
और जब वो
जीतने के करीब होता है
बस
बस उसी वकत वो
दिशाहीन ह जाता है
शायद वहीं से फिर
चारों दिशाएँ
निकलतीं है ........

जब भी... कभी
मैं लिखने बैठता हूँ
तो मन का घोडा
पता नहीं
किस किस को जिताता है
पर ...
मुझे हमेशा
लिखनी पड़ती है
एक हार की गाथा
.........
सच कहूं
मुझे हार से डर लगता है
..........
सच कहूं
मुझे लिखने से डर लगता है

Thursday, February 24, 2011

हे कविता समता 7

हे कविता
समय के इस अंतराल में
जितना मैं बुढ़ापे की और बढ़ा
उतना तुम जवां हुई
मैं जितना कापां
उतना तुम सिथिर रही
मेरे चिहरे पर
जितनी लकीरें उभरी
उतना तुम संजीव होकर
मेरे इर्ध-गिर्ध घूमती रही
-------------
मैं तुम से
दूर रहने का परियास करता रहा
पर तुम मेरे बहुत करीब रही
मैंने तुम्हे शब्दों से दूर रखा
पर तुम मेरे लिए
आकाशी शब्द
ढूंढ ढूंढकर लाती रही
.....................
पर अब
जब मैं एक
लम्बे समय के बाद
तुम्हारे पास आया हूँ
तो मुझे महसूस हुआ के
इतना
संवेदनहीन नहीं हूँ मैं
..........................
हे कविता
अब जब तुम
फिर मेरे करीब हो
तो मुझे लगता है
जाने की कोई
पारीभाषा नहीं होती ।

Sunday, February 20, 2011

कैवल्य समता 6

कैवल्य
वो संवेदना के शहर से
चुप की भाषा बोलती
इस जिस्म के गाँव में
चांदनी सी तरंगे घोलती
गलीओं की अंतड़ीओं में
पदचाप की उर्जा टटोलती
निरंतर गातीशील है
पैरों की उंगलीओं की कलमों से
माथे पर लिखी हुई
इबारत की
तीसरी आँख तक ...

मैं तो फिसलता रहा हूँ
हर जनम
अप्पने ही जिस्म से
और गिरता रहा हूँ
कहीं बहुत दूर
भटकता रहा हूँ
अप्पने आप को पड़ने के लिए
दौड़ता रहा हूँ
अप्पने आप को छूने के लिए
उस सिफ़र की तलाश में
जो मेरी तीसरी आँख बनता
माथे पर लिखी इबारत
पड़ने के लिए
मेरी रोशनी बनता ......

सदीयां बीती
वकत गुज़रे
समय बदला
स्थान बदले
पर मैं ....मैं ही रहा
तूँ ना बन सका
हर वार कोई
दूर बहुत दूर से
पास आकर पुकारता रहा
मैं हर वार
अपनी किसी तृष्णा के रंगों से
कैनवास को सजाता रहा
तृप्ति के शब्दों को
किताबों में बुलाता रहा
ना जाने कौन सी
गिनती में गुमसुम
मैं हर आवाज़ को
दरकिनार करता रहा .......

लेकिन अब
कुदरत के इस लम्बे चौड़े
अदृश्य शिलालेख पर
मैंने पहली वार
वो नाम पड़ने की कोशिश की है
जो हमेशा से मेरा था
पहली वार
मैं तृष्णा की ज़मीन से उठकर
अप्पने ही भीतर से निकले
रमणीक राह पर
बे-पैर होकर चला हूँ
मुकती की तरफ
कैवल्य की और
मुझे देख लो
जान लो
पहचान लो
मैं वकत के आईने के सामने
आख़री वार खड़ा हूँ ....... ।

कोई पुकार रहा है
संवेदना के शहर से ।

जब से समता 5

जब से मैं  तेरे साज़ की चुप हूँ ।
तब से अपनी आवाज़ की चुप हूँ ।

मुझ को मालूम है  कहाँ जाना ,
इस लिए हर आगाज़ की चुप हूँ ।

शब्द होते तो अर्थ मिल जाते ,
मैं तो उम्र-ए- दराज़ की चुप हूँ ।

तुम ने वादा कोई निभाया था ,
मैं तेरे उस लिहाज़ की चुप हूँ |

मैं ना सुकरात हूँ ना सरमद हूँ ,
मैं तो अपने ही राज़ की चुप हूँ ।

मैं तो 'जसबीर 'जीत पाया ना ,
इस लिए हर मुहाज़ की चुप हूँ।

ग़ज़ल..p3

मैं पत्थर हूँ मुझे जीना नहीं भगवान सा बनकर ।
मुझे रहना नहीं खुद में कोई मेहमान सा बनकर ।

कोई जीता यां हारा ख़ाक मेरी ही उडी हर पल ,
रहा मैं ज़िन्दगी की जंग का मैदान सा बनकर ।

मेरी हर सोच में रहता है यह बाज़ार दुनिया का ,
मैं अप्पने घर पड़ा रहता हूँ बस सामान सा बनकर ।

रहा हूँ मैं तेरी दुनिया में जैसे मैं नहीं कुछ भी ,
रहा मैं दूर मैं मैं से कहीं बेजान सा बनकर ।

मेरे अंदर छुपा ऐसा भी है "जसबीर " का चिहरा ,
जो मुझको रोज़ मिलता है मगर अनजान सा बनकर ।

ग़ज़ल .....५

वो मुझको पहनकर जब अपने घर को लौट जाते हैं ।
तो हर दीवार को आईना समझकर मुस्कराते हैं ।

तेरी तस्वीर बनते ही कहीं उनसे बिखर जाती ,
वो तारे इस लिए ही रात सारी तिलमिलाते हैं ।

अभी हैं इस जगह ना जाने कल फिर किस जगह होंगे,
कदम मेरे बिना मुझको लिए भी दौढ़ जाते हैं ।

बसाया है अभी आँखों में जैसे मैं कोई आँसू ,
मुझे बस देखना वो कब मुझे दरिया बनाते हैं ।

वो कैसे खोलें दरवाज़े अगर 'जसबीर' दे दस्तक ,
हवा सी उँगलियाँ लेकर लुटेरे भी तो आते हैं ।