Thursday, April 22, 2010

कुछ बातें

मैं आज हूँ
तज़रबे रहत आज
मेरा अतीत
मेरे आज में
फैला हुआ है
मेरा भविष
मेरे आज को
निगल जाना चाहता है
कुछ बातें
समझ आने के बहुत करीब हैं....

जाग कर देखता हूँ
किसी पल को
मेरे माथे पे
बैठा पाता हूँ
आँखें बंद करता हूँ
कोई माथे का दरवाज़ा खोल
भीतर ही भीतर
सीड़ीआँ उतरता है
पल पल की ठक -ठक
सिर में गूँज रही है
कुछ कुछ बातें समझ आने लगीं हैं .....

कैसी मैं है
जो बिखरती जा रही है
कैसी तूँ है
जो मुझे खंडित नहीं होने देती
असधारण पल हैं
ना मैं है
ना कोई कोशिश
ना कुछ होने का एहसास है
कुछ कुछ बातें समझ आ गयी हैं .....

कुछ बातें समझ आने के
बहुत करीब हैं ...
कुछ बातें समझ कर भी
समझ नहीं आती ... ।

Saturday, April 10, 2010

मेरे अंदर जो औरत है

मेरे अंदर जो औरत है
बिलकुल तुम्हारे जैसी है
इसलिए शायद
वो तुम से मिलने के लिए बेचैन है
मैं वार वार उसे मिलाने के लिए
तेरी और खींचा चला आता हूँ
लेकिन हर वार उसकी तड़प को
दो- गुना करके
अपने ही अंदर
कहीं और गहरा पाता हूँ ....

तुम मुझे जब पहली वार मिली
तो मुझे लगा
जैसे मैं तुम्हे बहुत पहले से
जानता हूँ ...पहचानता हूँ
दूसरी वार मुझे लगा
जैसे कोई अनजानी धरती
हमारे बीच है
तीसरी वार हमने कोशिश करके
एक सांझी धरती ढूंढ ली थी
जिस पर हम तीनो खड़े हो सकते थे .....

फिर अचानक... एक दिन
तुम्हारे अंदर का आदमी
मुझे मिलने आया
सच कहूं ...
वो मुझे बिलकुल नहीं जानता था
वो मुझे बिलकुल नहीं पहचानता था
मैं उसके जैसा कहीं से था भी नहीं
वो लौट गया था शायद
या तुमने उसे अपने ही अंदर
कहीं बन्द कर लिया था .....

अब ...जब भी हम मिलते हैं
तो हम त्रिकोण के मिलन -बिन्दुओं पर खड़े होकर
एक दूसरे को निहारते हैं
एक बिंदु ...
दूर कहीं बहुत दूर
हमारे निकट आने की कोशिश में
और भी सदीओं दूर चला जाता है
उस वकत ...
हमारे नीचे की सांझी धरती में
कुछ रेखाए उभर आती है .... ।

लेकिन अब ...
जब मैं जागती आँखों से देखता हूँ
तो पाता हूँ .....
के मेरे अंदर जो औरत है
बिलकुल तुम्हारे जैसी नहीं है ...
और तुम्हारे अंदर जो आदमी है
कितना मुझसे मिलता है... ।

Sunday, March 21, 2010

जब से

जब से में तेरे साज़ की चुप हूँ ।
तब से अपनी आवाज़ की चुप हूँ ।

मुझ को मालुम नहीं कहाँ जाना
इस लिए हर आगाज़ की चुप हूँ ।

अपने ही आप से में लड़ता हूँ ,
जाने किस किस मुहाज़ की चुप हूँ ।

मैं तेरे वासते जिया हर पल ,
मैं तो उम्मरे-दाराज़ की चुप हूँ ।

तुम में हर पल ही जो बदल जाता ,
मैं तेरे उस मजाज़ की चुप हूँ ।

मैं ना सुकरात हूँ ना सरमद कोई,
पर खुदा के ही राज़ की चुप हूँ ।

Thursday, January 7, 2010

ख़त

कभी तो ख़त आयेगा
अनजाने सप्पनों के गठरी उठाऐ
और मेरे घर की दहलीज़ पे आकर
अपना बोझ गिराएगा
कभी तो ख़त आयेगा .....

तरह तरह के गीत सुनाएगा
कई भाषाओँ का जिकर करेगा
मेरे आँसूओं के रंगों से
अपना लिबास मिलाएगा
कभी तो ख़त आयेगा .....

अपनी होंद को जताकर
मेरे माथे पर उभर आये
प्रशन-चिन्हों की वियाख्या करेगा
बीते लम्हों को याद कराएगा
कभी तो ख़त आयेगा .....

कई यादें कई कहानीयां
पलों छिनो में बियान कर जाएगा
वकत की चरखरी से
उमर की डोर उतारेगा
कभी तो ख़त आयेगा .....

अनचाहे सपनों के गठरी उठाये ...

Sunday, December 27, 2009

रेखा से सिफ़र तक

और मैं
फिर सिफ़र बन गया
एक वकत था
जब काल की लम्बी सड़क पर
मैं एक सिफ़र था
महज़ सिफ़र
फिर किसी के हसीन पाँव
इस सिफ़र पर पड़े
और मैं सिफ़र से
एक सीधी रेखा बन गया ...

फिर शुरू हुआ
इस रेखा का सफ़र
तेरे शहर के रंगीन चित्र पर
पर मैं अकेला नहीं था
मेरे साथ कई और रेखाएँ भी
चल रहीं थी
बिलकुल मेरे समांतर...

मैं इंतज़ार में था
संधूरी पद चाप को
औढ कर बैठा
सफ़र की होंद का
प्रशन चिन्ह पहने
बाकी रेखाओं की ही तरह ...

फिर मैंने खुद
इन्ही आँखों से देखा
एक सिफ़र को सीधी रेखा
बनते हुए
बिलकुल मेरी तरह ...

और मैं फिर
सिफ़र बन गया
फिर शुरू हुआ
काल की लम्बी सड़कों पर
इस सिफ़र का सफ़र
जमाह घटाओ की होंद से
बहुत दूर
एक
अन्नत सफ़र की तलाश में ।

Sunday, December 20, 2009

हुआ तकसीम

हुआ तकसीम कितनी वार मैं हांसिल नहीं कोई।
मैं चलता जा रहा हूँ पर मेरी मंज़िल नहीं कोई ।

मेरे अंदर मुहब्बत करने वाला आदमी था जो ,
वो अपनी मौत ही मारा गया कातिल नहीं कोई ।

बड़ा सोचा था बस तैरेंगे आँखों के सुमन्दर में ,
मगर डूबे तो फिर आया नज़र साहिल नहीं कोई ।

हमेशा नींद के दरवाज़े पे मैं ठहर जाता हूँ ,
मुझे लगता मेरे खाबों में भी महफ़िल नहीं कोई ।

खुदा के पास रहता हूँ उसी के साथ चलता हूँ
वो मुझ को फिर भी कहता है मेरा कामिल नहीं कोई ।


हमारे मन में लगते हैं हजारों रोज़ ही मेले ,
हमारे साथ तनहाई में यु शामिल नहीं कोई ।

Thursday, December 10, 2009

एक परदा है

एक परदा है
भीतर ही भीतर
लटक रहा
मूलाधार से सहस्रार तक
सात छल्ले घूम रहें है
अपने सफर में
धरती की तरह
एक सीधी रेखा में
एक महा सूर्य के इर्द -गिर्द
बाहर से इक आवाज़ आती है
जो कह रही है
उसे महा -सूर्य दिखता नही
ऊर्जा घूमती हुई महसूस नही होती
निगल गयी हैं सब
दो आँखे खुशक सी
बोल रहीं हैं भीतर
सब भ्रमजाल है ....

तीसरी आँख जख्मी है
फ़िर भी तर है
आंसूओं से
बाहर देखती है
कुछ भी साफ दिखता नहीं
कुछ हो रहा है
पल पल बेहोशी की यात्रा में लींन है
एक दौड़ है
सभी दौड़ रहें हैं
कहाँ जाना है
कुछ पता नहीं
रो रही है तीसरी आँख
देख रही है
बाहर का भ्रमजाल ....

एक परदा है
दोनों और ज़िन्दगी है
इक दूजे से झगड़ रही है
अपने अपने भ्रमजाल को
कोस रही है
परदा गिरने तक
पारदर्शी होने तक ॥