Sunday, February 20, 2011

मैं लोगों ने समता-2

मैं जो लोगों ने पहने उन नकाबों को नही समझा ।
मैं बूड़ा आदमी बच्चों के खाब्बों को नहीं समझा ।

सवाले-यार था इतना के आखिर तुम मेरे क्या हो ,
मैं अपने ही दिए लाखों जबाबों को नही समझा ।

वो ख़ुद मिलने को कहते हैं मगर आते नही मिलने ,
मैं सारी उम्र ही उनके हिसाबों को नही समझा ।

वो मेरी हर ग़ज़ल में है नुमाया और नज़्मों में  ,
मैं उस पे ही लिखी अपनी किताबों को नही समझा ।

वो हैं परदा-नशीं फ़िर भी हमेशा चाँद से लगते ,
मैं काले बादलों जैसे हिजाबों को नही समझा ।

बहुत  लोगो के जीवन में अँधेरा ही अँधेरा है ,
मैं उसके इतने सारे आफ्ताबों को नही समझा ।

यूं तो हर रात ही 'खामोश 'सी मेरी  गुज़रती है ,
मैं फ़िर भी चीख़ बनकर आए खाब्बों को नही समझा ।

रोज़ यूं समता-1

रोज़ यूं मर- मर के जीना ज़िन्दगी होती नही ।
हम से अब तो रोज़ ही ये खुदकशी होती नही ।

ज़र्द पत्ता हूँ बढाऊँ कांपता सा हाथ मैं ,
पर मेरी पागल हवा से दोस्ती होती नही ।

जिस की आँखों में भी झांकू भीड़ सी आये नज़र,
हम से इतने शोर में तो बंदगी होती नही ।

फूल खिलते ही गिरी हो लाश भंवरे की जहाँ
उस जगह कोई भी खुशबू बावरी होती नही ।

मैं मेरे अंदर से बोलूँ इस जगह कैसे रहूँ ,
दम मेरा घुटता यहाँ भी बंसरी होती नही ।

अब तो बस इत्हास बनना चाह रहा हर आदमी ,
अब किसी चिहरे पे कोई ताज़गी होती नही ।

पत्थरों के शहर में पत्थर बना जसबीर भी ,
अब किसी आईने से कोई दोस्ती होती नहीं ।

Friday, February 18, 2011

राख का संगीत

शब्द
ध्वनि
चुप
दीये जले
रौशनी हुई
...............
हर कोई
आज़ाद है
जलने के लिए
पतंगे की तरह
...................
राख का संगीत
सुनने के लिए
.................
आ जाओ
राग दीपक बज उठा है
मंडप सज चुका है ..I

Sunday, August 8, 2010

मैं पत्थर हूँ ... ग़ज़ल

मैं पत्थर हूँ मुझे जीना नहीं भगवान सा बनकर ।
मुझे रहना नहीं खुद में कोई मेहमान सा बनकर ।

कोई जीता यां हारा ख़ाक मेरी ही उडी हर पल ,
जिया मैं ज़िन्दगी को जंग का मैदान सा बनकर ।

मेरी हर सोच में रहता है यह बाज़ार दुनिया का ,
मैं अप्पने घर पड़ा रहता हूँ बस सामान सा बनकर ।

मेरे अंदर मेरे चिहरों में इक ऐसा भी चिहरा है ,
जो मुझ को रोज़ मिलता है मगर अनजान सा बनकर ।

रहा हूँ मैं तेरी दुनिया में जैसे मैं नहीं कुछ भी ,
रहा मैं दूर मैं मैं से कहीं गुमनाम सा बनकर ।

कहाँ कैसे मिलु तेरा कोई अरमान सा बनकर ,
अभी रहता हूँ अप्पने पास मैं मेहमान सा बनकर ।

Saturday, June 26, 2010

तुम ..मैं

तुम जीत ही गयी
.......
मुझे खेलना नहीं आता
मैं जानता हूँ ...
बस खेलते हुए
खेल खेल में हार जाता हूँ मैं .....

पर
तुम ??
हर वार जीत जाती हो
तुम ... यानि कौन ?
बहुत चिहरे हैं
इस
तुम के पीछे
सब के सब
अप्पने ही लिए खेले
एक जंग की तरह खेले
और ....
जीतते गये
हर वार ............
इश्तहार बदलते रहे
कभी कुश ....
कभी कुश ....
............
जाते रहे
जाना कहाँ होता है
.....
शायद
जाने हुए
अनजाने सफर में
पता नहीं ...
मैं हर वार
हारी हुई जंग
जीत कर आता हूँ
और अप्पने ही अंदर
खुद को मुर्दा पाता हूँ
..........