Saturday, September 15, 2012

                  ग़ज़ल
                                   

मुझको आँखों में तुम बसाओ  तो   ।।
मुझको मुझसे  कभी  मिलाओ  तो  ।।

मेरे  हाथों  पे   हाथ   रखो    तो ,
कुछ   लकीरें   नई  बनाओ    तो ।

होश  ही  होश फिर रहे  मुझको ,
जाम पे  जाम  गर  पिलाओ  तो ।

मेरे  मन  में लिखा  पढ़ो  तुम भी ,
रिशते  ऐसे  कभी  निभाओ  तो ।

खुद से  चोरी  मुझे भी  देखो तो ,
और  फिर खुद को भूल जाओ तो ।

शब्द 'खामोश' तो नहीं होते
यूं  ही मुझ  को कभी बुलाओ तो ।

4 comments:

  1. रिश्ते बने ही निभाने के लिए हैं

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